Volume : 7, Issue : 7, JUL 2021

VASUDHAIV KUTUMBAKAM KE AADARSH KA MURT RUP - GAVARI (वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्ष का मूर्तरूप - गवरी)

Dr. Mohan Lal Jat (डॉ. मोहन लाल जाट)

Abstract

गवरी नृत्य विषिष्ट वर्ग अथवा जाति की धरोहर होते हुए भी यह समस्त लोक के आदर्ष, कला, षिल्प, संस्कृति तथा वैभव को अपने में समाहित किये तथा जनमानस को एक स्वरूप में बांधे रखता है। यह विषुद्ध धार्मिक व सामाजिक भावनाओं के साथ किया जाने वाला यह अनुष्ठानपरक नृत्य है। कब समाज ने किस नृत्य को जन्म दिया इसका निष्चित समय बता पाना कठिन है। आज के नृत्य नाट्य अंगों भावों का परिष्कृत रूप है जो धीरे-धीरे परम्पराओं व पीढ़ी दर पीढ़ी के अनुभव से प्रदर्षनधर्मी कलारूपों के साथ जाना गया। आज की महŸाी आवषयकता है कि इन कलात्मक पक्षों को सकारात्मक दृष्टि प्रदान कर समाजोंपयोगी बनाया जाए जिससे समाज की क्रियाषिलता को बढ़ावा मिलेगा।

Keywords

Article : Download PDF

Cite This Article

Article No : 8

Number of Downloads : 22

References

1. देवीलाल सामर, भारतीय लोक कला ग्रन्थावली, भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर (राजस्थान) 1980
2. डॉ. महेन्द्र भानावत, उदयपुर के आदिवासी , लोक नाट्यः उद्भव और विकास, भारतीय लोक कला मण्डल, उदयपुर (राजस्थान) 1903
3. उपाध्याय वासुदेव, राजस्थान की कला, संस्कृति और साहित्य, विवेक प्रकाषन, उदयपुर (राजस्थान) 1981
4. वाचस्पति गैरोला, भारतीय नाट्य परम्पराएँ और अभिनवदर्पण, स्वास्तिक पब्लिकेषन, इलाहाबाद, 1967
5. मालिनी काले, भील समुदाय, हिमांषु प्रकाषन, उदयपुर (राजस्थान) 1987