Volume : 3, Issue : 12, DEC 2017

SAASAARAAM KE DAKSHINEE KSHETR MEIN JAL PRADOOSHAN KEE SAMASYA EVAN SAMAADHAAN: EK BHAUGOLIK ADHYAYAN

UMESH KUMAR

Abstract

संसाधन पर्यावरण एवं मानव प्रकृति के अभिन्न अंग है। आदि मानव की अधिकांश आवश्यकताए प्रकृति के प्रत्यक्ष सम्पर्क से पुरी होती थी। आदि काल में मानव सभ्यता का विकास नदी धाटियों में जल की उपलब्धता के कारण हीं हुआ। जल जीवमण्डल में सर्वाधिक महत्वपूर्व तत्व है क्योकि एक तरफ तो यह सभी जीवों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक तत्व है, तो दूसरी तरफ यह जीवमंडल पोषक तत्वों के संचरण तथा चक्रण में सहायता करता है। इसका अलावा जल बिजली के निर्माण (उत्पादन) फसलों की सिंचाई, नौकापरिवहन सिवेज के निषटान आदि के लिए महत्वपूर्ण होता है। ज्ञातव्य है कि जीवमण्डल के समस्त जल का मात्र एक प्रतिशत हीं जल विभित्र स्त्रोतों यथा- भूमिगत जल, सरिता जल, झील जल, मृदा में स्थित जल, वायूमंडलीय जल आदि से मानव समुदाय के लिए सुलभ हो पाता है। इनमें से भूमिगत जल सबसे अधिक जल प्रदान करता है। औयोगिकरण नगरी करण तथा मानव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण जल की भाग में गुणोत्तर वृद्धि हुई है। फल स्वरुप जल की गुणवत्ता में भारी गिरावट आयी है यद्यपि जल में स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता होती है परन्तु जब मानव जनित स्त्रोतों से उत्पन्न प्रदूषकों का जल में इतना अधिक जमाव हो जाता है कि वह जल की सहन शक्ति तथा स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता से अधिक हो जाता है तो जल प्रदूषित हो जाता है।
जल की भौतिक, रसायनिक, तथा जैविक विशेषताओं में हानिकरण प्रभाव उत्पन्न करने वाले परिवर्तन को जल प्रदूषण कहते है।

Keywords

जलापूर्ति, शुद्ध, पेयजल, नगर परिषद, संप, जलमीनार, सालाई, फलोराइड युक्त, शहरवासियों, जिम्मेवारी, प्रदूषण, टाइफाइड, पीलिया, डायरिया ।

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References

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  4. हिन्दुस्तान गुरूवार 28 अप्रैल 2016 गया पेज सं0 -6।
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  6. हिन्दुस्तान मंगलवार 14 फरवरी 2017 गया पेज सं0 -4।