Volume : 5, Issue : 9, SEP 2019

DALIT AANDOLAN VA DALIT VIMARSH KE TATTV: SAAMAAJIK-SAAHITYIK DRSHTI SE

DR GOPIRAM SHARMA, CHANDRAPAL JANDU

Abstract

दलित का अर्थ दमन से है, यह केवल जाति विषेष के लिए निष्चित नहीं किया जा सकता। एक पक्ष ’दलित’ को जाति विषेष से जोड़कर देखता है। दलितों के लिए भक्तिकाल से लेकर अब तक चिन्तन होता आया है। आज दलित आन्दोलन में स्वानुभूति-सहानुभूति के तत्त्वों को लेकर मतभिन्नता है। मूल तत्त्व दलित चेतना है और उसकी सम्यक प्रस्तुति से है। जो कोई भी दलित चेतना सम्पन्न होकर सफलतापूर्वक विचार सम्पे्रषण कर सकता है, उसे ही दलित साहित्यकार माना जाएगा। दलित हित और दलित चेतना को छोड़कर अन्य कोई तत्त्व महत्त्वपूर्ण नहीं है।

Keywords

दलित आन्दोलन, विमर्ष, साहित्य, अस्पृष्यता, अनुसूचित जाति, भक्ति आन्दोलन, अनुभूति, प्रामाणिकता, सहानुभूति, मानवतावाद, सामथ्र्यवान कवि, विषेषाधिकार, अस्तित्व, शोषण आदि।

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